कोलकाता मेट्रो (Kolkata Metro) भारत की पहली भूमिगत मेट्रो रेल सेवा है। इसका इतिहास काफी महत्वपूर्ण और रोचक है क्योंकि यह देश के शहरी परिवहन के विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित हुई। नीचे इसका विस्तृत इतिहास प्रस्तुत है:
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कोलकाता मेट्रो का इतिहास (History of Kolkata Metro in Hindi)
1. प्रारंभिक योजना
भारत में मेट्रो रेल की अवधारणा सबसे पहले 1960 के दशक में सामने आई थी।
1969 में मेट्रो रेलवे कोलकाता प्रोजेक्ट के लिए एक योजना तैयार की गई।
1971 में संसद ने मेट्रो रेलवे (कंस्ट्रक्शन ऑफ वर्क्स) एक्ट पारित किया।
2. निर्माण की शुरुआत
निर्माण कार्य 1972 में शुरू हुआ।
भारतीय इंजीनियरों के साथ सोवियत संघ और पूर्वी जर्मनी के विशेषज्ञों की मदद ली गई।
शुरुआत से ही कई तकनीकी और भू-वैज्ञानिक चुनौतियाँ सामने आईं क्योंकि कोलकाता की ज़मीन दलदली थी।
3. पहला चरण
24 अक्टूबर 1984 को कोलकाता मेट्रो का पहला चरण शुरू हुआ।
यह एस्प्लेनेड (Esplanade) से भूवनिपुर (Bhowanipore, जिसे अब नेताजी भवन कहा जाता है) तक लगभग 3.4 किलोमीटर लंबा मार्ग था।
यह भारत की पहली भूमिगत मेट्रो सेवा बनी।
4. विस्तार और प्रगति
धीरे-धीरे मेट्रो का विस्तार किया गया।
1995 तक यह दुम-दुम (Dum Dum) से टॉलीगंज (Tollygunge) तक लगभग 16.5 किलोमीटर लंबे खंड में चलने लगी।
बाद में कई चरणों में इसे आगे बढ़ाया गया।
5. आधुनिक विकास
2010 के बाद से कोलकाता मेट्रो का तेजी से विस्तार हुआ।
आज यह नेटवर्क कई नई लाइनों पर बन रहा है, जिनमें ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर (हावड़ा – सॉल्ट लेक – सेक्टर V) और अन्य नए मार्ग शामिल हैं।
वर्तमान में कोलकाता मेट्रो 40+ किलोमीटर से अधिक लंबे नेटवर्क पर चल रही है और भविष्य में इसे और बढ़ाया जाएगा।
6. विशेषताएँ
भारत की पहली भूमिगत मेट्रो सेवा (1984)।
कोलकाता मेट्रो को "भारत की लाइफलाइन" कहा जाता है, विशेषकर शहर के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के बीच।
यहाँ एसी कोच, आधुनिक टिकटिंग सिस्टम, और नई विस्तारित लाइनों में मेट्रो एलिवेटेड (ऊँचाई पर) और अंडरग्राउंड दोनों प्रकार से चल रही है।
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👉 संक्षेप में:
कोलकाता मेट्रो 1984 में भारत की पहली मेट्रो रेल के रूप में शुरू हुई थी। इसका निर्माण कार्य 1972 में शुरू हुआ और आज यह न केवल कोलकाता की पहचान है बल्कि भारत की मेट्रो रेल क्रांति की नींव भी है।
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