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अब मैं आपके लिए “माँ” विषय पर पूरा शब्दों का विस्तृत हिंदी लेख तैयार करता हूँ। इसमें मैं प्रस्तावना, धार्मिक दृष्टिकोण, साहित्यिक योगदान, त्याग, आधुनिक संदर्भ, वैज्ञानिक पहलू, कहानियाँ, कविताएँ और निष्कर्ष सब शामिल करूँगा।
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माँ (मातृत्व) पर विस्तृत लेख
प्रस्तावना
"माँ" – यह शब्द सुनते ही मन में अपनापन, ममता, त्याग और प्रेम की अनुभूति होती है। माँ केवल एक संबंध नहीं बल्कि जीवन का आधार है। संसार में यदि कोई प्रेम का सबसे शुद्ध रूप है तो वह माँ का प्रेम है। शिशु की पहली पुकार "माँ" ही होती है। यह शब्द छोटा अवश्य है, किंतु इसके अर्थ और भाव इतने व्यापक हैं कि इसे परिभाषित करना कठिन है।
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माँ का महत्व और भूमिका
1. जीवनदाता
माँ गर्भ में शिशु को धारण करती है। नौ महीने की कठिन यात्रा के बाद वह जीवन को जन्म देती है। यह केवल शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक संघर्ष भी है।
2. पालन-पोषण करने वाली
माँ अपने बच्चे के लिए दिन-रात समर्पित रहती है। वह भूखी रह सकती है लेकिन अपने बच्चे को भूखा नहीं रख सकती।
3. संस्कारदाता
बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर है और पहली शिक्षिका उसकी माँ। वह अपने व्यवहार, बोलचाल और आदतों से बच्चे के भीतर संस्कार डालती है।
4. प्रेरणास्रोत
इतिहास गवाह है कि हर महान व्यक्तित्व की सफलता के पीछे उसकी माँ का हाथ रहा है।
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माँ और धर्म
हिंदू धर्म में माँ
माँ को देवी का रूप माना गया है।
दुर्गा – शक्ति का प्रतीक।
सरस्वती – ज्ञान की देवी।
लक्ष्मी – धन और समृद्धि की देवी।
शास्त्रों में कहा गया है – “मातृ देवो भव” अर्थात माँ को देवता के समान मानो।
इस्लाम में माँ
इस्लाम धर्म में माँ का स्थान अत्यंत ऊँचा है। हदीस में कहा गया है कि "जन्नत माँ के कदमों तले है।" अर्थात माँ की सेवा करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
ईसाई धर्म में माँ
ईसाई धर्म में वर्जिन मैरी को ईश्वर की माता का स्थान दिया गया है। वे त्याग, करुणा और शुद्धता का आदर्श मानी जाती हैं।
सिख धर्म में माँ
गुरु ग्रंथ साहिब में माँ को प्रथम शिक्षक माना गया है। बच्चा माँ की गोद में ही ‘वाहेगुरु’ का नाम लेना सीखता है।
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साहित्य और माँ
हिंदी साहित्य में माँ
महादेवी वर्मा ने अपनी रचनाओं में माँ के त्याग और ममता का मार्मिक चित्रण किया।
मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में माँ का रूप गरीबी और संघर्ष के बीच भी करुणामयी दिखता है।
सुभद्राकुमारी चौहान की कविताओं में माँ का रूप राष्ट्रप्रेम से जुड़ा है।
विश्व साहित्य में माँ
रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की का उपन्यास मदर मातृत्व और क्रांति का अद्वितीय संगम है।
अंग्रेजी साहित्य में कई कवियों ने माँ को ईश्वर से भी बढ़कर बताया है।
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माँ का त्याग और बलिदान
माँ अपने बच्चों की खुशी के लिए हर कठिनाई सह लेती है।
वह अपनी नींद, आराम और इच्छाएँ त्याग देती है।
कभी बेटे की पढ़ाई के लिए गहने बेच देती है।
कभी बीमारी में बेटे की दवा लेने के लिए भूखी रह जाती है।
माँ का यह बलिदान ही उसे सबसे महान बनाता है।
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माँ और विज्ञान
गर्भावस्था के दौरान माँ का शरीर कई बदलावों से गुजरता है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि माँ का दूध शिशु के लिए अमृत समान है। इसमें रोगों से लड़ने की क्षमता होती है।
माँ और बच्चे का भावनात्मक बंधन भी वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध है।
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माँ और समाज
समाज की नींव माँ पर टिकी है। वह एक पीढ़ी को जन्म देती है और उसका निर्माण करती है। यदि माँ सशक्त है तो समाज और राष्ट्र भी सशक्त बनते हैं।
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आधुनिक समय की माँ
आज की माँ केवल घर तक सीमित नहीं है।
वह नौकरी करती है, व्यापार करती है, राजनीति में भाग लेती है।
वह घर और बाहर दोनों जगह संतुलन बनाती है।
फिर भी बच्चों के लिए समय निकालना नहीं भूलती।
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माँ पर कविताएँ और कहावतें
"माँ" शब्द सुनते ही हृदय भर आता है।
हिंदी में कहा जाता है – “जिस घर में माँ होती है, वहाँ स्वर्ग बसता है।”
कबीरदास ने कहा – “माई-बाप समान कोई नहीं।”
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माँ के बिना जीवन
माँ का साया जब सिर से उठ जाता है, तो जीवन में गहरी रिक्तता आ जाती है। माँ के बिना घर सूना लगता है। उसकी यादें जीवन भर संबल बनती हैं।
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माँ और मातृदिवस (Mother’s Day)
दुनिया भर में मई के दूसरे रविवार को मातृदिवस मनाया जाता है। यह दिन माँ के योगदान को सम्मान देने का अवसर है।
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निष्कर्ष
माँ जीवन की पहली और सबसे महान शिक्षक है। उसका प्रेम निस्वार्थ है। उसका त्याग अनंत है। माँ का महत्व शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। माँ वास्तव में ईश्वर का रूप
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