वेटो पावर (Veto Power) : एक विस्तृत अध्ययन
1. प्रस्तावना
वेटो पावर (Veto Power) आधुनिक राजनीति और प्रशासन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका अर्थ है किसी निर्णय, प्रस्ताव या बिल को रोकने या अस्वीकार करने का विशेषाधिकार। यह शक्ति सामान्यतः विशेष व्यक्तियों, संस्थाओं या देशों को दी जाती है ताकि वे अपने अधिकार क्षेत्र में किसी ऐसे निर्णय को रोक सकें जो उनके लिए प्रतिकूल या हानिकारक हो सकता है।
“वेटो” शब्द का शाब्दिक अर्थ है – “मैं मना करता हूँ”। यह शक्ति लोकतांत्रिक और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संतुलन बनाए रखने का एक उपकरण भी है और कई बार आलोचना का कारण भी।
🔹 वेटो पावर का उद्गम (Origin of Veto Power)
"Veto" लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है – “मैं निषेध करता हूँ” (I Forbid)।
2. वेटो शब्द की उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
वेटो शब्द लैटिन भाषा से आया है।
प्राचीन रोम में “Veto” का प्रयोग सीनेट और मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाता था।
प्राचीन रोम में "Tribal Assembly" द्वारा बनाए गए कुछ कानूनों को रोकने का अधिकार "Roman Tribune" को था।
रोम की राजनीति में “Tribune of the Plebs” (जनता के प्रतिनिधि) को यह अधिकार था कि वे अमीर वर्ग के खिलाफ लिए गए किसी भी फैसले को “Veto” कर सकते थे।
इस प्रकार यह शक्ति एक लोकतांत्रिक रक्षा तंत्र के रूप में शुरू हुई, ताकि शक्तिशाली वर्ग गरीबों के हितों को दबा न सके।
समय के साथ यह अवधारणा विभिन्न देशों की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्थाओं में शामिल हो गई।
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3. वेटो पावर के प्रकार
भारत और विश्व राजनीति में वेटो पावर कई रूपों में देखा जाता है। प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं:
(क) संपूर्ण वेटो (Absolute Veto)
जब किसी प्रस्ताव या बिल को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया जाए।
भारत में राष्ट्रपति किसी निजी सदस्य द्वारा प्रस्तुत बिल या संसद भंग हो जाने के बाद भेजे गए बिल पर संपूर्ण वेटो का प्रयोग कर सकते हैं।
(ख) सस्पेंसिव वेटो (Suspensive Veto)
इसमें राष्ट्रपति या अधिकारी किसी बिल को अस्वीकार कर पुनः विचार के लिए लौटा सकते हैं।
यदि संसद पुनः उस बिल को पास कर देती है, तो राष्ट्रपति को उसे मंजूरी देनी पड़ती है।
(ग) पॉकेट वेटो (Pocket Veto)
इसमें किसी बिल को लंबे समय तक लंबित रखा जाता है, न तो उसे स्वीकृति दी जाती है और न ही अस्वीकृति।
भारत में राष्ट्रपति इसका प्रयोग कर सकते हैं क्योंकि भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के पास समय सीमा का उल्लेख नहीं है।
उदाहरण: राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने “पोस्टल अमेंडमेंट बिल” (1986) को पॉकेट वेटो में रखा था।
(घ) अंतरराष्ट्रीय वेटो (International Veto)
यह शक्ति केवल कुछ विशेष देशों के पास है, जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के पाँच स्थायी सदस्य (P5)।
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4. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वेटो पावर का महत्व
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वेटो पावर का सबसे प्रमुख प्रयोग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में होता है।
सुरक्षा परिषद संरचना:
कुल 15 सदस्य देश
5 स्थायी सदस्य (P5) – अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस
10 अस्थायी सदस्य – जिन्हें 2 वर्ष के लिए चुना जाता है।
इन पाँच स्थायी सदस्यों के पास वेटो पावर है। किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित करने के लिए 9 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है, लेकिन यदि कोई भी स्थायी सदस्य वेटो कर दे तो प्रस्ताव अस्वीकार हो जाता है।
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5. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वेटो पावर की भूमिका
(क) शांति और सुरक्षा बनाए रखने में
UNSC अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का मुख्य अंग है।
किसी भी युद्ध, प्रतिबंध, शांति सेना भेजने या सैन्य हस्तक्षेप पर निर्णय लेने में वेटो पावर निर्णायक भूमिका निभाता है।
(ख) उदाहरण
अमेरिका ने इज़राइल के पक्ष में कई बार वेटो पावर का प्रयोग किया।
रूस ने सीरिया और यूक्रेन से जुड़े प्रस्तावों पर वेटो किया।
चीन ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान-आधारित आतंकवादियों को संयुक्त राष्ट्र की “आतंकी सूची” में डालने से रोकने के लिए वेटो लगाया।
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6. पाँच स्थायी सदस्य (P5) और उनकी शक्तियाँ
1. अमेरिका (USA):
वेटो का प्रयोग प्रायः इज़राइल की सुरक्षा और अपने वैश्विक हितों के लिए।
2. रूस (Russia):
शीत युद्ध काल से अब तक अनेक बार पश्चिमी देशों के खिलाफ वेटो का प्रयोग।
3. चीन (China):
एशियाई राजनीति में अपने प्रभाव को बढ़ाने और भारत जैसे देशों को रोकने के लिए वेटो का प्रयोग।
4. ब्रिटेन (UK):
अमेरिका के साथ मिलकर कई बार वेटो का प्रयोग किया।
5. फ्रांस (France):
अपेक्षाकृत कम प्रयोग, लेकिन यूरोपीय और अफ्रीकी राजनीति में सक्रिय भूमिका।
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7. वेटो पावर का दुरुपयोग और विवाद
अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि P5 देश अपने स्वार्थ और राजनीतिक हितों के लिए वेटो पावर का प्रयोग करते हैं।
इससे कई मानवीय संकट (जैसे सीरिया गृहयुद्ध, यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष) पर ठोस कदम नहीं उठ पाए।
विकासशील देश इसे अन्यायपूर्ण मानते हैं क्योंकि पूरी दुनिया का भविष्य केवल पाँच देशों की मर्जी पर निर्भर हो जाता है।
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8. भारत में राष्ट्रपति की वेटो पावर
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 111 में राष्ट्रपति की वेटो पावर का उल्लेख है।
राष्ट्रपति की भूमिका:
जब संसद कोई बिल पास करती है, तो वह राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।
राष्ट्रपति के पास विकल्प होते हैं:
1. स्वीकृति देना
2. अस्वीकृति देना (Absolute Veto)
3. पुनर्विचार हेतु वापस भेजना (Suspensive Veto)
4. लंबे समय तक रोकना (Pocket Veto)
भारत में राष्ट्रपति की वेटो पावर सीमित है क्योंकि अंतिम निर्णय संसद का होता है।
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9. भारत और संयुक्त राष्ट्र वेटो पावर की तुलना
बिंदु भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
प्रयोगकर्ता राष्ट्रपति P5 देश
प्रकार Absolute, Suspensive, Pocket केवल Absolute Veto
सीमाएँ संसद के दोबारा पास करने पर लागू करना अनिवार्य किसी स्थायी सदस्य का वेटो प्रस्ताव को पूरी तरह रोक देता है
प्रभाव आंतरिक कानून निर्माण वैश्विक राजनीति और शांति
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10. वेटो पावर के लाभ
शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने का साधन।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संतुलन बनाए रखने में मदद।
अल्पसंख्यक हितों की रक्षा।
निर्णयों पर गहन विचार को मजबूर करता है।
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11. वेटो पावर की हानियाँ
निर्णय प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
शक्तिशाली देशों का वर्चस्व बढ़ता है।
मानवीय मुद्दों पर निष्क्रियता बनी रहती है।
लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास।
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12. आधुनिक समय में वेटो पावर पर बहस और सुधार
कई देश चाहते हैं कि UNSC की संरचना बदली जाए।
भारत, जर्मनी, जापान और ब्राज़ील (G4 देश) स्थायी सदस्यता और वेटो पावर की मांग कर रहे हैं।
यह बहस तेज़ है कि वेटो पावर को खत्म किया जाए या इसे और देशों तक बढ़ाया जाए।
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13. भविष्य की संभावनाएँ
यदि वेटो पावर की संरचना बदली जाती है तो वैश्विक राजनीति अधिक न्यायपूर्ण हो सकती है।
भारत जैसे देशों की भागीदारी से UNSC अधिक लोकतांत्रिक और संतुलित बनेगा।
लेकिन यह तभी संभव होगा जब मौजूदा P5 देश अपने विशेषाधिकारों में कटौती स्वीकार करें, जो कठिन है।
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14. निष्कर्ष
वेटो पावर एक ऐसी शक्ति है जो लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय राजनीति दोनों में सुरक्षा कवच की तरह काम करती है, लेकिन साथ ही यह असमानता और अन्याय का कारण भी बनती है।
भारत में राष्ट्रपति की वेटो पावर सीमित और संतुलित है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर UNSC में यह कुछ देशों की विशेषाधिकार प्राप्त शक्ति बन चुकी है।
आज दुनिया को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें वेटो पावर का दुरुपयोग न हो और अंतरराष्ट्रीय निर्णय अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी हों।
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वेटो पावर (Veto Power) अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। इसका इतिहास समझने के लिए हमें अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विकास और संयुक्त राष्ट्र की स्थापना तक जाना होगा। यहाँ मैं आपको विस्तार से इतिहास बता रहा है
🔹 आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वेटो पावर
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के बाद लीग ऑफ नेशंस (League of Nations) बनी, लेकिन उसके पास स्थायी और प्रभावी "वेटो" जैसी शक्ति नहीं थी। इसके कारण वह जर्मनी, इटली और जापान जैसे आक्रामक राष्ट्रों को रोक नहीं पाई।
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के बाद जब संयुक्त राष्ट्र (United Nations – UN) का गठन हुआ (24 अक्टूबर 1945), तब बड़ी शक्तियों ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी सहमति के बिना कोई बड़ा निर्णय न लिया जा सके।
🔹 वेटो पावर के प्रयोग का इतिहास
पहला वेटो: 1946 में सोवियत संघ (USSR) ने पहला वेटो इस्तेमाल किया।
शीत युद्ध (Cold War) के दौरान सोवियत संघ और अमेरिका ने वेटो का बार-बार इस्तेमाल किया।
USSR (Russia) – ने सबसे अधिक वेटो का प्रयोग किया है।
अमेरिका (USA) – अक्सर इज़राइल से जुड़े प्रस्तावों को बचाने के लिए वेटो का उपयोग करता है।
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🔹 वेटो पावर से जुड़ी आलोचनाएँ
1. यह शक्ति केवल पाँच देशों को मिली है, जिससे वैश्विक लोकतंत्र पर सवाल उठता है।
2. कई बार एक ही देश का विरोध पूरे विश्व की सहमति पर भारी पड़ जाता है।
3. विकासशील देश और अफ्रीकी-एशियाई राष्ट्र इसे अन्यायपूर्ण मानते हैं।
🔹 सुधार की मांग
भारत, जापान, जर्मनी और ब्राज़ील जैसे देश लंबे समय से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वेटो पावर की मांग कर रहे हैं।
"G4 Nations" (India, Japan, Germany, Brazil) और "African Union" भी सुधार की पैरवी कर रहे हैं।
लेकिन वर्तमान P5 देश अपने अधिकार को सीमित करने के लिए तैयार नहीं हैं।
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👉 सारांश:
वेटो पावर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी विश्व व्यवस्था की उपज है, जिसे पाँच महाशक्तियों को दिया गया ताकि उनकी सहमति के बिना कोई अंतरराष्ट्रीय सैन्य या राजनीतिक फैसला न हो। यह शक्ति वैश्विक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है, लेकिन इसके कारण अंतरराष्ट्रीय न्याय और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल भी उठते हैं।
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