लिबिया में आग लगी — पूर्ण विवरण (LIBYA BURNS: Full Details in Hindi)
साल 2011 की शुरुआत में लिबिया नामक देश में भीषण गृहयुद्ध (Civil War) छिड़ गया था। इस संघर्ष की जड़ में था लिबिया के तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी (Muammar Gaddafi) का शासन, जो 1969 से देश पर काबिज़ थे। जैसे ही अरब स्प्रिंग (Arab Spring) की लहर अन्य अरब देशों में उठी, वैसे ही लिबिया के लोगों ने भी लोकतंत्र और आज़ादी की मांग शुरू कर दी। गद्दाफी के खिलाफ विद्रोहियों ने हथियार उठा लिए और देश दो हिस्सों में बँट गया — एक तरफ गद्दाफी की सरकारी सेना, दूसरी तरफ विद्रोही दल।
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🔥 पश्चिमी देशों का हस्तक्षेप
लिबिया में हिंसा लगातार बढ़ती जा रही थी। गद्दाफी की सेना ने विद्रोही इलाकों पर हमला शुरू कर दिया, जिसमें सैकड़ों नागरिक मारे गए। संयुक्त राष्ट्र (UN) और पश्चिमी देशों — विशेषकर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, और कनाडा — ने इस पर गहरी चिंता जताई।
24 मार्च 2011 को पश्चिमी देशों के युद्धक विमानों ने लगातार पाँचवीं रात लिबियाई टैंकों और सरकारी ठिकानों पर हवाई हमले (Airstrikes) किए। उद्देश्य था गद्दाफी की सेनाओं को विद्रोही इलाकों पर हमला करने से रोकना।
हालाँकि, इन हवाई हमलों के बावजूद गद्दाफी की सेना ने पश्चिमी लिबिया के विद्रोही कब्जे वाले शहरों पर गोलाबारी जारी रखी। मिसराता (Misrata) शहर, जो विद्रोहियों का गढ़ था, उस पर सरकार के टैंक और भारी तोपें लगातार हमला कर रही थीं।
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💣 मिसराता और अन्य शहरों में विनाश
मिसराता शहर के बाहरी इलाकों में हवाई हमलों से कुछ सरकारी टैंक नष्ट कर दिए गए, लेकिन शहर के अंदर मौजूद गद्दाफी के टैंक सुरक्षित रहे। मिसराता की गलियों में नागरिक फँसे हुए थे, भोजन और पानी की कमी हो गई थी, और अस्पतालों में घायल लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी।
इस लगातार लड़ाई ने अंतरराष्ट्रीय गठबंधन (International Coalition) को चिंतित कर दिया, जो गद्दाफी की हिंसा को रोकने की कोशिश कर रहा था।
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🌍 अंतरराष्ट्रीय गठबंधन और "नो-फ्लाई ज़ोन"
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) ने लिबिया में एक "नो-फ्लाई ज़ोन" (No-Fly Zone) लागू करने की अनुमति दी, ताकि गद्दाफी के विमानों को आम नागरिकों और विद्रोहियों पर हमले करने से रोका जा सके।
अमेरिका ने कहा कि उसने सफलतापूर्वक यह नो-फ्लाई ज़ोन स्थापित कर लिया है। इस ज़ोन का अर्थ था कि लिबिया के ऊपर गद्दाफी की किसी भी वायुसेना के विमान को उड़ने की अनुमति नहीं होगी, और यदि कोई विमान उड़ता दिखा तो उसे मार गिराया जाएगा।
अमेरिकी सेनाओं ने लिबिया के तट पर कई टैंकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। कुछ ही दिनों बाद, अमेरिका ने घोषणा की कि वह यह अभियान नाटो (NATO) को सौंप देगा।
27 मार्च 2011 को नाटो ने लिबिया में सैन्य अभियानों की कमान अपने हाथ में ले ली।
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⚔️ गद्दाफी का प्रतिरोध और विद्रोहियों का संघर्ष
गद्दाफी ने अंतरराष्ट्रीय दबाव को नज़रअंदाज़ कर दिया और दावा किया कि वह अपने देश की रक्षा कर रहे हैं। उन्होंने विद्रोहियों को "आतंकवादी" बताया और कहा कि पश्चिमी देश लिबिया पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
विद्रोही सेनाएँ पूर्वी लिबिया के बेंगाजी (Benghazi) और मिसराता जैसे शहरों से गद्दाफी की सेनाओं को पीछे धकेलने की कोशिश कर रही थीं। नाटो के हवाई हमलों ने विद्रोहियों को कुछ हद तक मदद दी, लेकिन ज़मीनी युद्ध कठिन और रक्तरंजित था।
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💀 गद्दाफी शासन का पतन
लगभग आठ महीनों की लड़ाई के बाद, गद्दाफी की सेना कमजोर पड़ गई। विद्रोही धीरे-धीरे राजधानी त्रिपोली (Tripoli) की ओर बढ़े और अगस्त 2011 में शहर पर कब्ज़ा कर लिया।
20 अक्टूबर 2011 को, गद्दाफी अपने गृहनगर सिर्ते (Sirte) में पकड़े गए और मारे गए।
उनकी मौत के साथ लिबिया में 42 वर्षों पुराना शासन समाप्त हो गया।
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🇱🇾 परिणाम और प्रभाव
गद्दाफी की मौत के बाद लिबिया में अस्थायी सरकार बनी, लेकिन देश में शांति नहीं लौट सकी। विभिन्न विद्रोही गुटों के बीच सत्ता संघर्ष जारी रहा, और लिबिया कई सालों तक राजनीतिक अराजकता और हिंसा में डूबा रहा।
पश्चिमी देशों का हस्तक्षेप भले ही गद्दाफी शासन को समाप्त करने में सफल रहा, लेकिन इसके बाद देश स्थिर नहीं हो सका। लिबिया आज भी (2025 तक) विभाजित राजनीति, सशस्त्र गुटों और विदेशी हस्तक्षेपों का शिकार है।
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📜 निष्कर्ष
"Libya Burns" शीर्षक उस दौर की भयावह स्थिति को दर्शाता है, जब पूरा देश जल रहा था —
एक तरफ लोकतंत्र की मांग करने वाले नागरिक,
दूसरी तरफ तानाशाह गद्दाफी की क्रूर सेना,
और ऊपर से विदेशी शक्तियों के हवाई हमले।
यह संघर्ष न केवल लिबिया बल्कि पूरे विश्व के लिए एक सीख बन गया —
कि किसी भी देश में जनता की आवाज़ को दबाने से अंततः विद्रोह और विनाश ही जन्म लेता है।
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