ममी (Mummy): इतिहास, प्रक्रिया, प्रकार और रहस्य – पूर्ण विवरण
ममी (Mummy) मानव सभ्यता के इतिहास का एक रहस्यमय, रोमांचक और अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। जब हम "ममी" शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में प्राचीन मिस्र, पिरामिड, फ़राओ, रहस्यमयी ताबूत और हजारों वर्षों से सुरक्षित मानव शरीर की छवि उभर आती है। ममीकरण केवल एक शव-संरक्षण प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक विश्वास, सामाजिक संरचना और वैज्ञानिक समझ का भी प्रतीक था।
यह लेख ममी के इतिहास, ममीकरण की प्रक्रिया, विभिन्न सभ्यताओं में ममी, इसके वैज्ञानिक पहलुओं, धार्मिक मान्यताओं, प्रसिद्ध ममियों और ममी से जुड़े रहस्यों पर विस्तृत प्रकाश डालता है।
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ममी क्या है?
ममी वह मानव या पशु शरीर होता है जिसे विशेष प्रक्रिया द्वारा सड़ने-गलने से बचाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक या कृत्रिम दोनों प्रकार की हो सकती है। आमतौर पर ममी शब्द का प्रयोग कृत्रिम रूप से संरक्षित शवों के लिए किया जाता है, जिनका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण प्राचीन मिस्र की ममियाँ हैं।
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ममी शब्द की उत्पत्ति
"ममी" शब्द अरबी भाषा के शब्द "मूमिया" (Mumiya) से आया है, जिसका अर्थ है बिटुमेन या राल जैसा पदार्थ। यूरोप में यह शब्द मध्यकाल में पहुँचा और धीरे-धीरे संरक्षित शवों के लिए प्रयोग होने लगा।
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ममीकरण का इतिहास
1. प्राचीन मिस्र
ममीकरण का सबसे विकसित और प्रसिद्ध रूप प्राचीन मिस्र में देखने को मिलता है। मिस्रवासियों का मानना था कि मृत्यु के बाद आत्मा (का) और चेतना (बा) को शरीर की आवश्यकता होती है। यदि शरीर नष्ट हो गया, तो आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।
इसी विश्वास के कारण मिस्र में शवों को हजारों वर्षों तक सुरक्षित रखने की कला विकसित हुई।
2. अन्य प्राचीन सभ्यताएँ
मिस्र के अलावा भी कई सभ्यताओं में ममीकरण के प्रमाण मिले हैं:
चीन – हान राजवंश की प्रसिद्ध "लेडी दाई" की ममी
दक्षिण अमेरिका – इंका और चिनचोरो सभ्यताएँ
तिब्बत – बौद्ध भिक्षुओं की स्वयं-ममीकरण परंपरा
यूरोप – कुछ धार्मिक नेताओं के प्राकृतिक ममीकरण
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ममीकरण की प्रक्रिया (प्राचीन मिस्र)
प्राचीन मिस्र में ममीकरण एक अत्यंत जटिल, धार्मिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया थी, जिसका उद्देश्य मृत्यु के बाद शरीर को सुरक्षित रखना था। मिस्रवासियों का विश्वास था कि आत्मा (बा और का) को परलोक में शरीर की आवश्यकता होती है। यह पूरी प्रक्रिया लगभग 70 दिनों में पूरी होती थी।
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चरण 1: शरीर की सफाई
मृत शरीर को सबसे पहले नील नदी के पवित्र जल से धोया जाता था।
इसके बाद शरीर को सुगंधित तेलों और जड़ी-बूटियों से शुद्ध किया जाता था, ताकि अशुद्धियाँ दूर हों।
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चरण 2: मस्तिष्क निकालना
नाक के रास्ते लोहे या कांसे के हुक डालकर मस्तिष्क को तोड़ा और बाहर निकाला जाता था।
मस्तिष्क को मिस्रवासी महत्वपूर्ण नहीं मानते थे, इसलिए उसे सुरक्षित नहीं रखा जाता था।
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चरण 3: आंतरिक अंगों को निकालना
शरीर के बाएँ भाग में एक छोटा सा चीरा लगाकर
फेफड़े
यकृत
पेट
आंतें
निकाली जाती थीं।
इन अंगों को अलग-अलग कैनोपिक जार (Canopic Jars) में सुरक्षित रखा जाता था।
👉 केवल हृदय को शरीर में ही छोड़ा जाता था, क्योंकि उसे बुद्धि और आत्मा का केंद्र माना जाता था।
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चरण 4: शरीर को सुखाना (नैट्रॉन का प्रयोग)
शरीर को एक विशेष नमक नैट्रॉन (Natron) से पूरी तरह ढक दिया जाता था।
यह नमक शरीर की नमी सोख लेता था और सड़न को रोकता था।
यह प्रक्रिया लगभग 40 दिनों तक चलती थी।
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चरण 5: शरीर में भराव
सुखाने के बाद शरीर खोखला हो जाता था, इसलिए उसमें
लिनन
राल
रेत या आरा-चूर्ण
भरा जाता था, ताकि शरीर का प्राकृतिक आकार बना रहे।
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चरण 6: शरीर पर तेल और राल लगाना
शरीर पर सुगंधित तेल और राल (Resin) लगाई जाती थी, जिससे
त्वचा सुरक्षित रहे
जीवाणु नष्ट हों
शरीर मजबूत बने
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चरण 7: पट्टियों में लपेटना
शरीर को सैकड़ों मीटर लंबी लिनन की पट्टियों से सावधानीपूर्वक लपेटा जाता था।
पट्टियों के बीच-बीच में
ताबीज
मंत्र लिखे काग़ज़
पवित्र प्रतीक
रखे जाते थे, जो आत्मा की रक्षा के लिए होते थे।
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चरण 8: धार्मिक अनुष्ठान
ममीकरण के अंत में पुजारी मंत्रोच्चार और धार्मिक क्रियाएँ करते थे।
“मुख खोलने की रस्म” (Opening of the Mouth Ceremony) की जाती थी, जिससे मृत व्यक्ति परलोक में बोल और देख सके।
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चरण 9: समाधि में रखना
अंत में ममी को
लकड़ी या पत्थर के ताबूत (सार्कोफेगस)
कब्र या पिरामिड
में रखा जाता था, साथ में भोजन, आभूषण और दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी रखी जाती थीं।
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निष्कर्ष
ममीकरण केवल शरीर संरक्षण की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह मिस्र की धार्मिक मान्यताओं, विज्ञान और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। इसी कारण आज भी हजारों वर्ष पुरानी ममियाँ सुरक्षित पाई जाती हैं।
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