मार्क्सवादी विचारधारा
मार्क्सवादी विचारधारा कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के विचारों पर आधारित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दर्शन है। इसका व्यवस्थित विकास 19वीं शताब्दी में हुआ। मार्क्सवाद समाज और इतिहास को मुख्य रूप से आर्थिक संबंधों, उत्पादन के साधनों और वर्ग-संघर्ष के आधार पर समझता है।
1. वर्ग-संघर्ष
मार्क्सवाद के अनुसार समाज में अलग-अलग वर्गों के हित अक्सर एक-दूसरे से टकराते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में मुख्य रूप से पूँजीपति वर्ग (बुर्जुआ वर्ग) और मजदूर वर्ग (सर्वहारा वर्ग) के बीच संघर्ष दिखाई देता है। पूँजीपति उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं, जबकि मजदूर अपनी श्रम-शक्ति बेचकर जीवनयापन करते हैं।
2. ऐतिहासिक भौतिकवाद
मार्क्सवादी चिंतन में इतिहास के विकास को समझने के लिए आर्थिक परिस्थितियों और उत्पादन संबंधों को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे ऐतिहासिक भौतिकवाद कहा जाता है। इसके अनुसार उत्पादन की व्यवस्था में होने वाले परिवर्तन समाज की संस्थाओं और सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करते हैं।
3. निजी संपत्ति की आलोचना
मार्क्सवाद विशेष रूप से उत्पादन के साधनों की निजी पूँजीवादी मिल्कियत की आलोचना करता है। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें उत्पादन के प्रमुख साधनों पर सामूहिक/सामाजिक नियंत्रण हो और उनका उपयोग व्यापक सामाजिक हित में किया जाए।
4. पूँजीवाद की आलोचना
मार्क्स ने पूँजीवादी व्यवस्था में मजदूरों के श्रम और उन्हें मिलने वाले पारिश्रमिक के बीच संबंध का विश्लेषण किया। उन्होंने अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value) की अवधारणा के माध्यम से बताया कि पूँजीवादी उत्पादन में श्रमिक द्वारा पैदा किए गए मूल्य और उसे मिलने वाली मजदूरी के बीच अंतर पूँजी संचय का आधार बनता है।
5. वर्गहीन समाज
मार्क्सवाद का अंतिम आदर्श वर्गहीन समाज है—ऐसा समाज जिसमें उत्पादन के साधनों के स्वामित्व के आधार पर पूँजीपति और मजदूर जैसे स्थायी आर्थिक वर्ग न हों तथा संसाधनों और उत्पादन का नियंत्रण सामूहिक सामाजिक हित में हो।
6. राज्यविहीन समाज
मार्क्सवादी सिद्धांत में अंतिम चरण को अक्सर राज्यविहीन और वर्गहीन साम्यवादी समाज के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण में राज्य को ऐतिहासिक रूप से वर्ग-संबंधों से जुड़ी संस्था माना जाता है; वर्गों के समाप्त होने के साथ राज्य के पारंपरिक राजनीतिक रूप के समाप्त या “मुरझाने” की कल्पना की जाती है।
मार्क्सवाद का मूल विचार है कि आर्थिक व्यवस्था और उत्पादन संबंध समाज के स्वरूप को गहराई से प्रभावित करते हैं, इतिहास में वर्ग-संघर्ष महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और पूँजीवादी वर्ग-संरचना को बदलकर एक वर्गहीन, शोषण-मुक्त तथा अंततः राज्यविहीन समाज की दिशा में बढ़ना चाहिए।
> एक महत्वपूर्ण अंतर: मार्क्सवाद का लक्ष्य केवल “हर व्यक्ति की निजी वस्तुएँ छीन लेना” नहीं है। मार्क्सवादी आलोचना मुख्यतः उत्पादन के साधनों के निजी पूँजीवादी स्वामित्व से संबंधित है।
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